Friday, October 4, 2019

44 सालों में घट गए 60% जंगली पशु, हर 3 घंटे में 30 हजार जीव-जन्तुओं की प्रजाति विलुप्त हो रही

लाइफस्टाइल डेस्क. एक अनुमान के मुताबिक धरती पर इंसानों की संख्या करीब 7.7 अरब है और जानवरों की करीब 87 लाख प्रजाति मौजूद है। यदि इनकी संख्या का अनुमान लगाया जाए तो इंसानों की संख्या से कई हजार ज्यादा हो जाएगी, लेकिन इंसानों का बेजुबानों पर कहर इस कदर है कि हर साल बड़ी संख्या में जानवर मार दिए जाते हैं। वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड के अनुसार वर्ष 1970 से 2014 के बीच मानव गतिविधियों के कारण पृथ्वी पर रह रहे सभी जीवों में से 60% की मौत हो गई। जबकि इस दौरान धरती पर इंसानों की आबादी दोगुनी हो गई है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के अनुसार, हर 3 घंटे में 30 हजार जीव-जन्तुओं की प्रजाति विलुप्त होती जा रही है। जीवों की इस लिस्ट में स्तनधारी, पक्षी, मछलियां, सरीसृप और उभयचरों की आबादी शामिल हैं। आजवर्ल्ड एनिमल डे है इस मौके पर पढ़िए जानवरों की आबादी का हाल

  1. इस रिपोर्ट ने दुनिया को चेतावनी दी है। इस चौंकाने वाली रिपोर्ट में बताया गया है कि वैश्विक आबादी खाद्य व संसाधनों की विशाल और बढ़ती खपत के बीच अरबों वर्षों के निर्माण के बाद बने जीवन के चक्र को नष्ट कर रही है। इस सच्चाई के बारे में वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड के अंतरराष्ट्रीय डायरेक्टर जनरल मार्को लैम्बर्टिनी का कहना है कि स्थिति बहुत खराब है और यह बदतर होती जा रही है। महज ट्रॉफी हंटिंग के नाम पर दुनियाभर में अब तक 12 लाख जंगली जानवरों को मारा जा चुका है। औसतन हर साल 70 हजार जानवर मारे जाते हैं। वैश्विक स्तर पर शेर, हाथी, लेपर्ड, गैंडा (काले और सफेद दोनों ही) और केप बफैलो ‘ट्रॉफी हंटिंग’ के नाम पर सबसे ज्यादा मारे जाते हैं। कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, नामीबिया, मैक्सिको और जिम्बाब्वे समेत कई देश ‘ट्रॉफी हंटिंग’ के लिए बदनाम हैं। वैश्विक स्तर पर सबसे ज्यादा ट्रॉफी हंटिंग दक्षिण अफ्रीका में ही होती है।

  2. अफ्रीकी शेरों की आबादी में पिछले 2 दशकों में 42 फीसदी की कमी आई है। पैंथेर डॉट ओआरजी के मुताबिक 100 साल पहले 2 लाख से ज्यादा शेर हुआ करते थे, लेकिन अब 90 फीसदी शेर लुप्त हो चुके हैं और इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन नेचर (आईयूसीएन) के अनुसार अब उनकी संख्या महज 20 हजार से 39 हजार के बीच ही रह गई है। आईयूसीएन ने इस शानदार विलुप्त होते जानवर को रेड लिस्ट में शामिल किया है।

  3. नाॅर्थ अमेरिका ब्रीडिंग बर्ड सर्वे के मुताबिक पिछले 50 वर्षों में गौरैया की संख्या 82% तक कम हो चुकी है। शहरों में बढ़ता हुआ प्रदूषण गौरैया के जीवन के लिए सबसे बड़ा संकट है। गैंडे की बात करें तो हर दिन औसतन 3 गैंडे शिकारियों द्वारा मारे जाते हैं। एक समय गैंडों की करीब दर्जनभर प्रजाति मौजूद थी, लेकिन आज की तारीख में महज 5 प्रजाति (एशिया में 3 और अफ्रीका में 2) रह गई है। विलुप्ति की कगार पर खड़े गैंडों का दक्षिण अफ्रीका में लगातार शिकार किया जाता है। नदियों और समुद्र में प्रदूषण की वजह से पानी में रहने वाले करीब 83% जीव खत्म हो चुके हैं। जलवायु परिवर्तन की वजह से बर्फीले इलाकों में पाए जाने वाला पोलर बियर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। अब इनकी संख्या सिर्फ 24 हजार रह गई है।

  4. इस चौंकाने वाली रिपोर्ट में बताया गया है कि लैटिन अमेरिका में जीव-जन्तुओं पर मानव गतिविधियों का सबसे बुरा प्रभाव देखने को मिला है। इस क्षेत्र में वन्यजीवन में करीब 90% की कमी आई है। इसके साथ ही पानी के जीव भी बेहतर स्थिति में नहीं हैं, क्योंकि वे 80% की खतरनाक दर से मर रहे हैं। इस कारण इस क्षेत्र में बड़ेपैमाने जानवर विलुप्त की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

  5. वैज्ञानिकों का मानना है कि दुनिया में पशु-पक्षी बड़े पैमाने पर विलुप्त होना शुरू हो गए हैं। हाल ही में किए गए विश्लेषणों से पता चलता है कि सभ्यता की शुरुआत से लेकर अब तक मानव जाति ने दुनियाभर में स्तनधारियों और पौधों की 83 फीसदी से ज्यादा आबादी को नष्ट कर दिया है। इसे स्थिती को बदलने के लिए प्रयास अभी से शुरू करने होंगे।

  6. रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रकृति को हो रहे नुकसान को रोकने के लिए हमें आने वाले 5 सालों में कॉर्बन न्यूट्रल सोसाइटी बनने की आवश्यकता है। इसके लिए हमें क्लिन एनर्जी और पर्यावरण के अनुकूल खाद्य उत्पादन के तरीकों को अपनाना पड़ेगा। इसके अलावा सभी का जीवन बनाए रखने के लिए हमें जंगल, जमीन और समुद्रों को प्राकृतिक रूप में बहाल करना होगा।

  7. प्रकृति के संरक्षण के लिए बनाए गए अंतरराष्ट्रीय संघ ने ऐसे जानवरों की सूची जारी की है जिन पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। इसके मुताबिक 5,583 ऐसी प्रजातियां हैं जिन्हें बचाने के लिए गंभीर रूप के काम किए जाने की जरूरत है। कम से कम 26 ऐसी नई प्रजातियां हैं जिन्हें साल 2017 में इस लिस्ट में शामिल किया गया।

  8. किसी एक नस्ल के 300 जानवर अगर बड़े भौगोलिक इलाके में फैले हैं और वहीं दूसरी नस्ल के 500 किसी एक छोटी जगह तक सीमित हैं, तो 500 जानवरों वाली नस्ल को पहले विलुप्तप्राय घोषित होगी, क्योंकि एक नस्ल के सभी जीव एक जगह रहते हैं तो माना जाता है कि बीमारी या आपदा के कारण सभी की मौत हो सकती है।



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