लाइफस्टाइल डेस्क. महात्मा गांधी सिर्फ पेशे से ही नहीं असल जिंदगी में भी वकील थे। बहस का विषय रहता था, कैसे खुद को स्वस्थ रखें। उनके तर्क में दूध से दूरी और अंगूर-मेवे खाने की सलाह शामिल रहती थी। एलोपैथी और दूसरी पद्धतियों से विरोध नहीं था लेकिन अधिक पक्ष में भी नहीं थे। उनका मानना था, बीमारी इंसान के पापों का नतीजा होती है, जो पाप करता है उसे भुगतना पड़ता है। तर्क था अगर आप जरूरत से ज्यादा खाएंगे तो अपच होगा। इसके इलाज के तौर पर उसे व्रत यानी परहेज करना पड़ेगा जो उसे याद दिलाएगा कि कभी जरूरत से ज्यादा नहीं खाना है। वे ज्यादातर समस्याओं का इलाज नेचुरोपैथी से करना पसंद करते थे। उनकी अनुशासित जीवनशैली ने उन्हें फिट तो रखा लेकिन खानपान में किए प्रयोगों ने सीख भी दी। राष्ट्रपिता की 150 जयंती पर भास्कर ने जाना कैसी थी उनकी दिनचर्या और विशेषज्ञों के मुताबिक उनके मायने क्या हैं? इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल की किताब गांधी एंड हेल्थ @ 150, एनसीईआरटी की पुस्तक और नेचुरोपैथी एक्सपर्ट डॉ. किरण गुप्ता से इन सवालों को जवाब समझने की कोशिश की।
-
सुबह 4 बजे : बिस्तर से उठना
एक्सपर्ट व्यू : नेचुरोपैथी और आहार विशेषज्ञ डॉ. किरण गुप्ता के मुताबिक, सुबह 4 बजे वातावरण में ऑक्सीजन शुद्ध होती है। जब ये शरीर में पहुंचती है तो ऊर्जा का संचार होता है और हीमोग्लोबिन बढ़ता है। थकावट नहीं महसूस होती है। डिप्रेशन, अस्थमा जैसी रोग पास नहीं आते। यही बापू की खासियत थी। वह ऊर्जावान थे, थकते नहीं थे और व्यक्तित्व सकारात्मक था।
सुबह 4.20 बजे : सुबह की प्रार्थना में शामिल होना, लेखन का काम भी कभी-कभी सुबह ही करते थे।
एक्सपर्ट व्यू : सुबह की प्रार्थना से मन को शांति मिलती है और यह आपके व्यवहार में भी दिखता है। मन जितना शांत होगा शब्द उतने ही प्रखर होंगे। बापू की लेखनी में हर शब्द के गहरे मायने हैं।
सुबह 7.00 बजे : 5 किलोमीटर की वॉक के बाद नाश्ता। आश्रम, बर्तन, मल-मूत्र की सफाई। अनाज को पीसना और सब्जियां काटना।
एक्सपर्ट व्यू : सुबह की यात्रा शरीर और दिमाग दोनों सक्रिय करती है क्योंकि बॉडी का ऑक्सीजन का स्तर बढ़ता है। थकावट खत्म होती है और शरीर में ताजगी का अनुभव होता है। बापू को सुबह आश्रम में सफाई से लेकर सब्जियों को काटने की आदत थी जो उन्हें शारीरिक रूप से सक्रिय और फिट रखता था।
सुबह 8.30 बजे : लोगों से मुलाकात करना, लेखन कार्य या फिर पढ़ने के लिए यह समय चुनते थे।
एक्सपर्ट व्यू : लोगों से मुलाकात, समस्याओं पर चिंतन और लिखने-पढ़ने का काम उनके दिमाग को सक्रिय रखने का काम करता था। ऐसी छोटी-छोटी आदतें उनकी पर्सनैलिटी में दिन-प्रतिदिन निखार लाने का काम करती थीं।
सुबह 9.30 बजे : सूरज की धूप में तेल से मसाज करवाते थे। दाढ़ी बनाने के लिए किसी भी तरह के साबुन का प्रयोग नहीं करते थे।
एक्सपर्ट व्यू : शरीर में कैल्शियम एब्जॉर्ब होने के लिए विटामिन-डी का होना जरूरी है। बापू मजबूत हड्डियों के लिए सुबह की धूप में तेज से मसाज कराते है क्योंकि यहां से विटामिन-डी मिलता था।
सुबह 11.00 बजे : दोपहर का खाना
एक्सपर्ट व्यू : नेचुरोपैथी में सूर्य की तीव्रता के मुताबिक, भोजन लेने की सलाह दी जाती है जैसे सुबह नाश्ते में कम खाना और दोपहर में पेटभर खाना लेना। 11 बजे खाना खाने से पाचनतंत्र मजबूत होता है। क्योंकि भोजन को पचने के लिए पर्याप्त समय मिल पाता है।
दोपहर 1 बजे : लोगों से मिलने का समय
एक्सपर्ट व्यू : दिनभर का एक लंबा वे लोगों से मिलने और बात करने में बिताते थे शायद इसीलिए उन्होंने खाने का समय सुबह 11 बजे चुना।
4.30 बजे : चरखा कातना
एक्सपर्ट व्यू : चरखा कातना उनके डेली रूटीन का हिस्सा था जो बताता है कि जीवन में नियम और परहेज के साथ अनुशासन का होना जरूरी है।
5.00 बजे : शाम का नाश्ता
एक्सपर्ट व्यू : लगातार लोगों से जुड़ने और उनसे संवाद के बाद ऊर्जा बनाए रखने के लिए वे शाम के नाश्ते में ज्यादातर फल और मेवा शामिल करते थे।
06.00 बजे : शाम की प्रार्थना और भाषण
एक्सपर्ट व्यू : प्रार्थना भी मानसिक ऊर्जा का स्रोत होती है। वह एक ओजस्वी वक्ता थे और उनके भाषण को लोग संजीदगी से सुनते थे।
06.30 बजे : शाम की वॉक
एक्सपर्ट व्यू : दिनभर के काम निपटाने के बाद शाम की चहलकदमी कान को काफूर करने और ऊर्जा भरने का काम करती है।
9.00 बजे : सोने की तैयारी। गांधी अक्सर हफ्तेभर के अपने अधूरों कामों को सोमवार तक पूरा कर लेते थे।
एक्सपर्ट व्यू : राष्ट्रपिता की दिनचर्या आदर्श है। नेचुरोपैथी और आयुर्वेद में भी सुबह जल्द उठने और सोने को बेहतर जीवनशैली का हिस्सा बताया है। -
- मशहूर लेखक रामचंद्र गुहा ने अपने लेख 'द महात्मा ऑन मेडिसन' में जिक्र किया है कि 1920, 30, 40वें दशक तक गांधी बीमारी का इलाज प्राकृतिक तरीकों से करते थे। इसमें विशेषतौर पर नेचुरोपैथी, आयुर्वेद और योग उनके जीवन का हिस्सा था। शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना है तो इलाज का आधार भी यही होना चाहिए, यही उनकी सोच थी।
- बीमारियों को दूर करने में वे हवा, आकाश, पानी, जल और मिट्टी का प्रयोग करते थे। एक बार उनका पुत्र मणिलाल विषम ज्वर से बीमार हो गया। निमोनिया की आशंका होने लगी। तब उन्होंने पारसी डॉक्टर को बुलाया, जिसने अंडे और मांस का शोरबा खिलाने की सलाह दी। लेकिन गांधी ने डॉक्टर की सलाह नहीं मानी। उन्होंने जल चिकित्सा और शरीर पर मिट्टी पट्टियां रखकर मणिलाल को स्वस्थ किया।
- मणिलाल स्वस्थ हो गए तो उन्होंने मकान छोड़कर खुला हवादार मकान लिया और उसमें रहने लगे। कुछ ऐसी घटनाएं भी हुईं जिनके कारण लोग आश्चर्य करने लगे और गांधी में विशेष परमात्मा की शक्ति देखने लगे। एक मरणासन्न लड़की की उन्होंने चिकित्सा की। जब वह अच्छी हो गई हो लोगों ने उन्हें जादूगर समझ लिया।
- गांधी ने लोगों को समझाया कि न मैं कोई जादूगर हूं न ही महात्मा। लड़की को मैंने एनीमा दिया है इससे उसके शरीर से विकार निकल गया और वह स्वस्थ हो गई। गांधी एनीमा, टब स्नान, मिट्टी की पट्टी, संतुलित भोजन और उपवास की मदद से लोगों की चिकित्सा करते थे।

-
- बापू खानपान में काफी प्रयोग करते थे। जैसे बेकरी से ब्रेड लाने की बजाय घर में मैदे से ब्रेड तैयार करते थे। मैदा पीसने के लिए घर में हाथों से चलाई जाने वाली चक्की का प्रयोग किया जाता था।
- उनका मानना था कि यह सेहत और आर्थिक स्थिति दोनों के लिए बेहतर था। गांधी खुद को फूडी कहते थे लेकिन जब उन्हें लगा कि खाने पर नियंत्रण रखने की जरूरत है तो उपवास शुरू किए। उनका मानना था कि जीवन के लिए दो बातें सबसे जरूरी हैं, खानपान में परहेज और उपवास। उन्होंने एक आश्रम में यात्रियों और उनके परिवारों को एक साथ रखने की योजना बनाई। उनके मित्र केलेन बेक ने एक हजार एकड़ जमीन मुफ्त में दे दी। इसका नाम उन्होंने अपने प्रेरणास्रोत टॉल्स्टॉय के नाम पर रखा और यह टॉलस्टॉय आश्रम कहनाया।
- आश्रम में झरना, दो कुएं और एक झोपड़ी थी। यहां शुद्ध हवा, जल, संतरे, खुबानी और बेर के पेड़ थे इसलिए उन्हें यह जगह प्राकृतिक चिकित्सा के लिए सबसे बेहतर लगी। हाथ से काम करने और खुली हवा में काम करने से आश्रमवासियों के चेहरे पर रौनक आ गई थी।
- आश्रम के लोगों कोकिसी न किसी कारणवश जोहेंसवर्ग जाना पड़ता था इसलिए खर्च बचाने का नियम बनाया गया। इसलिए आश्रमवासी जाते समय घर से ही नाश्ता ले जाते थे। नाश्ते में हाथ से पीसे हुए चोकर और आटे की रोट, मूंगफली का मक्खन और संतरों के छिलकों का मुरब्बा होता था।
बापू का ब्लड प्रेशर जांचने के लिए इस इक्विपमेंट का प्रयोग किया गया था, जिसका जिक्र इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च में भी किया गया है।
-
- स्टूडेंट लाइफ में अक्सर गांधी पैदल यात्रा करना पसंद करते थे। 1890 में लंदन में रोजाना शाम को 12 किलोमीटर पैदल चलते थे और सोने से पहले 30-45 मिनट की वॉक जरूर करते थे। उनकी फिट बॉडी का श्रेय शाकाहारी भोजन और एक्सरसाइज को जाता है।
- 1913 में उन्होंने कहा, खाना शरीर के लिए जरूरी है लेकिन एक्सरसाइज शरीर और दिमाग दोनों के लिए जरूरी है। सेवाग्राम में रहने के दौरान और आंदोलन में शामिल होने पर भी उनकी पैदल यात्रा कभी रुकी नहीं।
- सेवाग्राम में वे चार बजे खुली हवा में टलहने के लिए निकल जाते थे। बहुत से दर्शनार्थी और सवाल पूछने वाले भी उनके साथ हो लिया करते थे। लौटने के बाद वे तेल से मालिश कराते थे। नाश्ते में खजूर या किसी एक फल के साथ बकरी का दूध लेते थे। नाश्ते के बाद वे आश्रम में बीमार लोगों की सेवा करने पहुंच जाते थे।
- वे प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली में विश्वास करते थे इसलिए मरीजों को भी भोजन में फल और जरूरत पड़ने पर उपवास कराते थे। कुष्ट रोगियों की सेवा करने में उन्हें खास आनंद मिलता था। सेवाग्राम में एक बार ऐसे सज्जन भी आए जो बिना आग पर पका भोजन खाते थे। गांधी ने इसे अपने जीवन में भी लागू किया।
- काफी समय तक अंकुरित कच्चा अन्न उनके खानपान का हिस्सा रहा। लेकिन उन्हें पेचिस की शिकायत होने लगी। कई बार नीम की कई पत्तियां खाने के कारण उन्हें चक्कर आने लगे थे। कई प्रयोगों के बाद वह घर की चक्की में पिसे चोकर वाले आटे की डबलरोटी के कुछ टुकड़े, खजूर, अंगूर, गेहूं की रोटी, शहद, मौसम्मी, नींबू, मेवे और बकरी का दूध भोजन और नाश्ते में शामिल किया था।
-
- बापू उपवास को शारीरिक सफाई का विकल्प मानते थे। एक समय ऐसा भी था जब महात्मा गांधी दूध और अनाज को छोड़कर सिर्फ फल और मेवे पर निर्भर रहने लगे। उनका मानना था सिर्फ मां का दूध छोड़कर इंसान को खानपान में दूध लेने की जरूरत नहीं है। गांधी इसके विकल्प के तौर पर अंगूर और बादाम खाने की वकालत करते थे।
- उनका कहना था इनमें पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्व होते हैं जो ऊत्तकों और तंत्रिकाओं के लिए जरूरी हैं। यही उनकी दिनचर्या का हिस्सा था लेकिन गुजरात के खेड़ा में एक अभियान के दौरान वह गंभीर रूप से बीमार हुए, कारण था खानपान में अधिक प्रयोग करना। उन्होंने डॉक्टर, वैद्य और वैज्ञानिकों से दूध का विकल्प ढूंढने की गुजारिश की।
- गांधी के एक लेख में इसका बात जिक्र भी है कि उन्होंने गाय या भैंस का दूध न पीने का प्रण लिया था लेकिन गिरते स्वास्थ्य के कारण उन्होंने बाद में बकरी का दूध पीना शुरू किया। इसके बाद भी उन्होंने उपवास रखने का सिलसिला जारी रखा।

-
- गांधी को सेहत से इतना ज्यादा लगाव था कि वह 18 साल की उम्र में दवाओं की स्टडी करने इंग्लैंड जाना चाहते थे लेकिन पिता ने इसकी अनुमति नहीं दी। वे चाहते थे बेटा बैरिस्टर बने। वे कहते थे कि बीमारी इंसान के पापों का नतीजा होती है, जो पाप करता है उसे भुगतना पड़ता है।
- तर्क था अगर आप जरूरत से ज्यादा खाएंगे तो अपच होगा। इसके इलाज के तौर पर उसे व्रत रखना पड़ेगा जो उसे याद दिलाएगा कि कभी जरूरत से ज्यादा नहीं खाना है। राजकोट में कुछ महीने वकालत करने के बाद मुंबई आ गए यहां भी वकालत करने लगे। इस दौरान भी बीमारियों की चिकित्सा अपने ढ़ंग से करते थे। उन्हें प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति पर विश्वास था।
- अफ्रीका में उन्होंने कई बीमारियों का इलाज किया था। इंग्लैंड में महात्मा गांधी पसली के दर्द से भी जूझे। उस समय वे मूंगफली, कच्चे और पके केले, नींबू, जैतून का तेल, टमाटर और अंगूर का सेवन कर रहे थे। दूध और अनाज बिल्कुल नहीं ले रहे थे।
- डॉक्टरों और गुरु गोखले जी के कहने पर अनाज खाने की बात नहीं मानी। फलाहार से धीरे-धीरे उनका स्वास्थ्य सुधरने लगा। डॉक्टरों ने छाती पर जो पट्टी बांधी दी उसे भी उतार फेंका। डॉक्टरी चिकित्सा पर उन्हें बिल्कुल भी विश्वास नहीं था।
Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today
from Dainik Bhaskar https://ift.tt/2nqt35D
No comments:
Post a Comment