लाइफस्टाइल डेस्क. हैदराबाद का प्रिया भारती हाई स्कूल विवादों में हैं। स्कूल प्रशासन ने हाल ही में नर्सरी, एलकेजी और यूकेजी के टॉपर्स के नाम की एक होर्डिंग लगवाई है। होर्डिंग सामने आने के बाद स्थानीय लोग और सोशल मीडिया यूजर स्कूल की आलोचना कर रहे हैं। तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुई हैं। स्कूल प्रशासन का कहना है ऐसा उन्होंने अभिभावकों के कहने पर किया है। अलोचना के बाद स्कूल प्रशासन ने होर्डिंग को हटाने का निर्णय लिया है।
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स्कूल प्रशासन से जुड़े जी. सुंदर बाबू का कहना है, हम बच्चों के टैलेंट को दिखाना चाहते थे और ऐसा करने के लिए अभिभावकों ने आग्रह किया था। हमें नहीं मालूम था कि लोग इसे हद तक नापसंद करेंगे। पिछले दो दिनों से लोगों के सवालों का जवाब देते हुए स्कूल प्रशासन तंग आ चुका है। फोन पर लोग सवाल-जवाब में अभद्र भाषा का प्रयोग कर रहे हैं।
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स्कूल प्रशासन से जुड़े सुंदर बाबू के मुताबिक, स्कूल में छात्रों की संख्या 200 से भी कम है। इनमें से ज्यादा बच्चे आर्थिक रूप से कमजोर हैं। दावा है कि टॉपर्स के अलावा होर्डिंग में ऐसे बच्चों के नाम और तस्वीरें भी शामिल की गई हैं जिन्होंने पढ़ाई के अलावा दूसरे सेक्शन में नाम रोशन किया है। हम ऐसे सभी बच्चों की सफलता को बिना भेदभाव के सेलिब्रेट करना चाहते थे लेकिन इसने नए विवाद को जन्म दे दिया।
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पूरा मामला सोशल मीडिया, पेरेंट्स और स्थानीय लोगों के बीच बहस का विषय बना हुआ है। स्कूल के ही एक अभिभावक सौजन्य का मानना है कि इसमें कुछ भी गलत नहीं है। जब 10वीं कक्षा के बच्चों का नाम मेरिट में आने पर उनके पोस्टर लगाए जाते हैं तो बच्चों का क्यों नहीं। बच्चों की सफलता को सेलिब्रेट करना चाहिए। ऐसा करने के लिए जिन पेरेंट्स ने स्कूल से आग्रह किया था, सौजन्य भी उनके से एक हैं।
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शिक्षाविद् पद्मजा शॉ का कहना है इसे लिए पेरेंट्स जिम्मेदार हैं। इतनी कम उम्र में बच्चों पर कॉम्पिटीशन के लिए दबाव गलत है। यह उन्हें गलत रास्ते पर ले जा सकता है क्योंकि जब युवा कॉम्पिटीशन का दबाव नहीं झेल पाते तो बच्चों से क्या उम्मीद की जाए। ऐसी स्थिति में कम उम्र से ही बच्चे अपनी पर्सनैलिटी तैयार करने लगते हैं। भविष्य में उनके मुताबिक चीजें न होने पर वे डिप्रेशन में जा सकते हैं। सुसाइड करने की नौबत भी आ सकती है।
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एक अन्य स्कूल की अध्यापिका शर्मिला इस तर्क से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि यह मामला बच्चों में किसी तरह की कॉम्पिटीशन की भावना को नहीं बढ़ाता है क्योंकि आठ साल की उम्र तक बच्चे इसे समझ ही नहीं पाते हैं। वह कहती हैं दूसरे स्टूडेंट्स से तुलना युवाओं को मानसिक रूप से परेशान करती है न की ऐसे बच्चों को।
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