लाइफस्टाइल डेस्क. नवरात्रि के समापन के बाद देशभर में 8 अक्टूबर को विजयादशमी यानी दशहरे का पर्व मनाया जाएगा। त्रेता युग में इस तिथि पर भगवान श्रीराम ने राक्षस रावण का वध किया था, इसलिए इस दिन रावण दहन और मेले का आयोजन किया जाता है। जानें देश की ऐसी पांच जगह जहां के दशहरे की रौनक दुनियाभर में प्रसिद्ध है।
छत्तीसगढ़ में बस्तर जिले के दण्डकरण्य में भगवान राम अपने चौदह वर्ष के दौरान रहे थे। इसी जगह के जगदलपुर में मां दंतेश्वरी मंदिर है, जहां पर हर वर्ष दशहरे पर वन क्षेत्र के हजारों आदिवासी आते हैं। बस्तर के लोग 600 साल से यह त्योहार मनाते आ रहे हैं। इस जगह पर रावण का दहन नहीं किया जाता। यहां के आदिवासियों और राजाओं के बीच अच्छा मेल जोल था। राजा पुरुषोत्तम ने यहां पर रथ चलाने की प्रथा शुरू की थी। इसी कारण से यहां पर रावण दहन नहीं बल्कि दशहरे के दिन रथ चलाया जाता है।
दशहरा को कर्नाटक का प्रादेशिक त्योहार माना जाता है। मैसूर का दशहरा पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। यहां पर दशहरा देखने के लिए लोग दुनियाभर से आते हैं। यहां पर दशहरा का मेला नवरात्रि से ही प्रारंभ हो जाता है। इसमें लाखों लोग शिरकत करते हैं। मैसूर में दशहरा का सबसे पहला मेला 1610 में आयोजित किया गया था। मैसूर का नाम महिषासुर के नाम पर रखा गया था। इस दिन मैसूर महल को एक दुल्हन की तरह से सजाया जाता है। गायन वादन के साथ शोभयात्रा निकाली जाती है।
कर्नाटक के मदिकेरी शहर में मनाया जाने वाले दशहरा का पर्व 10 दिनों तक शहर के 4 बड़े अलग अलग मंदिरों में आयोजित होता है। इसकी तैयारी 3 माह पहले से ही शुरू कर दी जाती है। दशहरे के दिन से एक विशेष उत्सव (मरियम्मा) की शुरुआत होती है। मान्यता है कि इस शहर के लोगों को एक खास तरह की बीमारी ने घेर रखा था, जिसे दूर करने के लिए मदिकेरी के राजा ने देवी मरियम्मा को प्रसन्न करने के लिए इस उत्सव की शुरुआत की।
हिमाचल प्रदेश में कुल्लु के ढालपुर मैदान में मनाए जाने वाले दशहरे को भी दुनिया का प्रसिद्ध दशहरा माना जाता है। हिमाचल के कुल्लु में दशहरे को अंतरराष्ट्रीय त्योहार घोषित किया गया है। यहां पर लोग बड़ी तादाद में आते हैं। यहां दशहरे का त्योहार 17वीं शताब्दी से मनाया जा रहा है। यहां पर लोग अलग-अलग भगवानों की मूर्ति को सिर पर रखकर भगवान राम से मिलने के लिए जाते हैं। यह उत्सव यहां 7 दिन तक मनाया जाता है।
राजस्थान के कोटा शहर मे दशहरे का आयोजन 25 दिनों तक लगातार होता है। इस मेले की शुरुआत 125 वर्ष पूर्व महाराव भीमसिंह द्वितीय ने की थी। यह परंपरा आज तक निभाई जा रही है। इस दिन यहां रावण, मेघनाद और कुंभकरण का पुतला दहन किया जाता है। इसके साथ ही भजन कीर्तन के साथ ही कई प्रकार की प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती हैं। इसलिए यह मेला प्रसिद्ध मेलों में से एक है।
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