नई दिल्ली (मुकेश काैशिक).कैंसर के कहां कितने मरीज हैं, इसका पता लगाने के लिए देश में पहली बार मरीजों की जियो टैगिंग की जा रही है। इस आधार पर एक नक्शा तैयार किया जा रहा है ताकि समय रहते इस बात का पता चल जाए कि कैंसर के ज्यादातर मरीज देश के किन इलाकों में हैं औरइलाज करवाने के लिए किनसेंटरों तक पहुंच रहे हैं। जहांमरीज ज्यादा होंगे, वहां लाल कलर का बिंदु नक्शे में आकार ले लेगा।
जियाे टैग में मरीज औरउसकी बीमारी की पूरी जानकारी संग्रहित रहेगी। शुरुआती टैगिंग से पता चला है कि महाराष्ट्र के अलावा कैंसर के ज्यादातर मरीज देश के पूर्वोत्तर में हैं। यहां संख्या लगातार बढ़ रही है। मरीजों की जियाे टैगिंग का काम टाटा मेमोरियल सेंटर कर रहा है, जो परमाणु ऊर्जा विभाग के तहत काम करता है।
कैंसर के हर साल 16 लाख मामले
स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक कैंसर के हर साल 16 लाख मामले सामने आ रहे हैं। इनमें सबसे अधिक दो लाख आंतों के कैंसर के हैं, जबकि ब्रेस्ट कैंसर के मामले एक लाख 40 हजार हैं। एक लाख मामले ओरल कैंसर, 45 हजार पुरुषों के ओरल कैविटी के कैंसर और 90 हजार मामले गले के कैंसर के हैं।
बीमारी से लड़ने का सरकारी ढांचा नाकाफी
टाटा मेमोरियल सेंटर के मुताबिक कैंसर के दो तिहाई मरीजों का इलाज प्राइवेट अस्पतालों में हो रहा है, क्योंकि इस बीमारी से लड़ने का सरकारी ढांचा नाकाफी है। जियो टैगिंग से पता चला है कि पिछले 6 महीने में 75 हजार मरीज टाटा मेमोरियल सेंटर पहुंचे। यह संख्या अगले साल 80 हजार तक पहुंच जाएगी।कैंसर पर शोध करने वाली अंतरराष्ट्रीय एजेंसी ग्लोबोकैन के अनुसार, भारत में कैंसर रोगी लगातार बढ़ रहे हैं। अगले 15 साल में यह संख्या 13 लाख सालाना से बढ़कर 2035 में 17 लाख सालाना तक पहुंच जाएगी। कैंसर से होने वाली मौतों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। 2018 में 8 लाख मौतें हुईं, जो 2035 में 13 लाख हो जाएगी।
इलाज के लिए ‘स्पाेक एंड हब’ माॅडल पर विचार हो रहा
कैंसर से लड़ने के लिए गठित संसदीय समिति ‘स्पाेक एंड हब’ माॅडल पर विचार कर रही है। इसके तहत राज्य स्तर पर मामूली कैंसर से लड़ने के लिए ‘स्पोक’ की तरह स्थानीय अस्पताल बनाए जाएं और कैंसर से लड़ने के लिए इन अस्पतालों का हब अलग से हो। समिति काे 130 स्पोक, 30 हब बनाने की सिफारिश मिली है।
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