दुनियाभर में भले ही अब तक नए कोरोनावायरस की वैक्सीन न तैयार हो पाई हो लेकिन इंसानको संक्रमित करने वाले पहले कोरोनावायरस के खोज की कहानीदिलचस्प है। इसे 16 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़ने वाली एक बस ड्राइवर की बेटी जून अमलेडा ने 1964 में खोजा था। सर्दी-खांसी से जूझ रहे मरीजों केनाक के सैम्पल को जून ने इलेक्ट्रॉनमाइक्रोस्कोपी में देखा तो एक ताजनुमा (क्राउन) वायरस दिखा। जब इस बात की जानकारी जर्नल और सीनियर को दी तो उन्होंने यह कहते हुए रिसर्च रिजेक्ट करदी कि इसकी तस्वीर काफी खराब है लेकिन बाद में यह खोज इतिहास बनी। कोरोनावायरस एक क्रॉउन की तरह दिखता है इसके आधार पर ही इसका नाम कोरोनारखा गया।
बतौर लैब टेक्नीशियन शुरू किया था करियर
स्क्रॉटलैंड की अमलेडा एक वायरस विशेषज्ञ थीं। उनका जन्म 5 अक्टूबर 1930 में ग्लासगो में हुआ था। पिता एक बस ड्राइवर थे और आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाईका खर्च नहीं उठा पाए तो अमलेडा को 16 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़नी पड़ी। अमलेडा ने ग्लासगो की एक लैब में बतौर टेक्नीशियन के तौर पर काम करना शुरूकिया। वैनेजुएला के एक आर्टिस्ट से शादी के बाद वह कनाडा आ गईं। टोरंटो के ऑन्टेरियो कैंसर इंस्टीट्यूट में उन्होंने बतौर इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी टेक्नीशियनकाम करना शुरू किया।
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