लघुकथा: तुम माफ़ करते?
लेखक : रूपाली डोले
अस्पताल के सेमी प्राइवेट रूम से, विवेक को एक चिर-परिचित आवाज़ सुनाई दी। बेड पर लेटे-लेटे वह देखने की कोशिश कर रहा था लेकिन बीच में पर्दा होने से कुछ भी स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहा था। तभी नर्स विवेक के पास आई, जिसे देखकर उसके होश उड़ गए। यह वही अंकिता थी जिसे कैंसर होने का पता चलते ही विवेक ने अपनी सगाई तोड़ दी थी।
आज वह ख़ुद किडनी की बीमारी से पीड़ित था। अंकिता का व्यवहार विवेक के प्रति वैसा ही था, जैसा अन्य मरीज़ों के साथ। उसके चेहरे पर कोई विशेष भाव नहीं थे। विवेक ने अपने आपको काफ़ी रोकने की कोशिश की, किंतु वह रोक नहीं पाया। उसने पूछ ही लिया, ‘तुम यहां कैसे?’
अंकिता ने बड़ी ही सहजता से विवेक के हर सवाल का जवाब दिया, ‘जब तुमने सगाई तोड़ दी तब बीमारी से ज़्यादा तुमसे दूर रहना तकलीफ़देह था। लेकिन इसके बाद भी जीना तो था! मेरा इलाज किया गया। मैंने नर्सिंग का कोर्स तो किया ही था, सोचा जीवन लोगों की सेवा में लगा दूं, तब से इसी अस्पताल में कार्यरत हूं।’
विवेक के चेहरे पर पश्चाताप के भाव साफ़ नज़र आ रहे थे। उसने अंकिता से माफ़ी मांगी और उससे अपनी ज़िंदगी में फिर से लौटने का अनुरोध किया। इस पर अंकिता ने जवाब दिया, ‘बड़ी मुश्किल से तो अपने आत्मसम्मान को, अपने आत्मविश्वास को जगाया है। अब फिर से खोना नहीं चाहती। बस तुमसे एक ही सवाल पूछना चाहती हूं- यदि यही सब मैं तुम्हारे साथ करती, तो क्या तुम मुझे माफ़ करते?’
विवेक अब मौन था। वह समझ चुका था कि उसने एक बहुत अच्छी जीवनसंगिनी को अपने स्वार्थ में हमेशा के लिए खो दिया है।

लघुकथा : मिट्टी के भगवान
लेखक : रश्मि स्थापक
‘मां, मैंने कह दिया मैं मिट्टी के गणेश जी नहीं लाऊंगा। मेरी एक मूर्ति से कोई पर्यावरण बनने-बिगड़ने वाला नहीं। मैंने इतना अच्छा छत्र बनाया है, उसके नीचे चिकनी फिनिशिंग वाली ही मूर्ति अच्छी लगेगी।’ चिंटू ने घर आसमान पर उठा लिया, आख़िर वीना ने हथियार डाल दिए। पांच सौ रुपए का नोट मिलते ही चिंटू बाहर भागा। उसने साइकिल उठाई ही थी कि बरतन मांजने वाली ताई का भोलू दौड़ता हुआ आता दिखाई दिया। ‘भैया... भैया... भैया... गणेश जी की मूर्ति लाया हूं। आजकल सब यही मूर्तियां खरीद रहे हैं...।’
‘तुम तो दुकान लगाने वाले थे न भोलू?’
‘भैया, रात भर पानी गिरा। पूरे घर में पानी भरा था। मिट्टी तो लाया था मैं, पर सब बह गई, जितनी मिट्टी बची थी उससे पांच मूर्तियां बनी हैं... रंग भी लगा नहीं पाई मां।’
चिंटू कुछ सोच में पड़ गया...
‘सबको साठ में दे रहा हूं, आपको पचास में दे दूंगा।’ निराश होता हुआ भोलू बोला।
‘ठीक है...’ चिंटू जैसे निर्णायक स्वर में बोला। तब तक भोलू मूर्तियों को निकालकर आंगन में संभालकर जमा चुका था।
‘आपको जो अच्छी लगे ले लो।’ भोलू की आवाज़ में उत्साह वापस आ रहा था। थोड़ी देर तक चिंटू उन मूर्तियों को देखता रहा... शुद्ध मिट्टी की बनी हुई बिना रंग वाली अनगढ़ मूर्तियां... उसके सपने वाली मूर्ति से बिलकुल अलग। ‘भोलू, ऐसा करो पांचों मूर्तियां दे दो... ताई जी, चाचाजी और दोनों दीदी को भी देनी होगी।’ भोलू ख़ुशी से उछल पड़ा।
झोला चिंटू को सौंपकर वो तो जैसे शहंशाह हो गया और मां जो खिड़की से ये ऐतिहासिक सौदा होते देख रही थी... उसकी आंखें तो कुछ नम थीं, पर चेहरे पर अपने संस्कारों का दर्प भी चमक रहा था।

कविता : बचपन
लेखक : किसलय पंचोली
सच वह सदा रहता है भीतर
हम ही नहीं जीते उसे
बड़े होने की सलीब को ढोते हुए
होकर स्वत: मजबूर।
बचपन, जामन-सा होता है
मन-भगोने में बस ‘यह करना है’ का
जरा गुनगुना दूध डाल देखो
जी उठता है वह ताजे दही सा!
बचपन, जब यूं उमगे अपनेआप
जी लेना उसे भरपूर
चाहे उम्र हो पचपन
या उससे भी कहीं अधिक।
जैसे कभी पेड़ों पर डले
रस्सी वाले झूलों की
जितनी हो सके उतनी
ऊंची से ऊंची पींगे चढ़ा-चढ़ा कर!
या समुद्र किनारे बिखरी
सीपियों, शंखो, बालू रेत को
अपनी उभरी नसों वाले हाथों से
जी भर बटोर-बटोर कर।
या जंगल में घूमते हुए
अचानक दिख जाती
जमीन के ऊपर निकल आई जड़ों पर
संभलकर हौले से कूद-कूद कर।
या बस यूं ही अकेले में
कभी आदमकद आइने के सामने
मन भर कर गाते हुए
हांफनी आने तक नाच-नाच कर।
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