लाइफस्टाइल डेस्क. जीवन में पर्याप्त धन हो तो हम धनवान अवश्य हो सकते हैं मगर ‘लक्ष्मीवान’ तो वही होता है जिसके जीवन में धन के साथ आरोग्य, रूप, सहकार और सम्बंधों की भी सम्पदा हो। ऐसी ही लक्ष्मी पूर्ण होती है। दीपपर्व के पांच दिनों में यही प्रेरणा निहित है। हर दिन का अपना अलग संदेश है, किंतु ये आपस में सम्बंधित भी हैं और मिलकर एक सुखी, समृद्ध और संतुष्ट जीवन की राह दिखाते हैं। यही जीवन में ‘लक्ष्मी’ का वास कहलाता है। धर्म-संस्कृति के अध्येता डॉ. विवेक चौरसिया से जानिए कैसे लक्ष्मी को परिपूर्ण बनाएं...
-
कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी धन्वंतरि की पूजा का दिन है। इसलिए कि सारे धन का तभी कोई अर्थ है जब हम स्वस्थ हों। अस्वस्थ व्यक्ति के लिए तीनों लोक के भोग भी निरर्थक हो जाते हैं। अमृत तक पीने के लिए स्वस्थ होना अनिवार्य है। समुद्र मंथन की पौराणिक कथा में अमृतकलश लेकर भगवान धन्वंतरि का प्रकट होना इसी का संकेत है। वे आरोग्य के देवता हैं, सिखाते हैं कि जीवन में स्वास्थ्य और आरोग्य से बड़ा कोई धन नहीं।
-
यह रूप सम्पदा का प्रतीक पर्व है। शास्त्रोक्त है, सच्चा रूपवान वह है जिसका मन निर्मल और परोपकार के भाव से भरा है। किसी ग़रीब को दिवाली की छोटी-सी ख़ुशी देने का भाव व्यक्तित्व को असल रूपवान बनाता है। आरोग्य के साथ आंतरिक सौंदर्य का यही संदेश लिए रूप चतुर्दशी हमें ‘सच्ची रूप सम्पदा’ साधने की सीख देने आती है। श्रीकृष्ण के हाथों नरकासुर के वध का संदर्भ जुड़ा होने से यह नरक चतुर्दशी भी है।
-
दीपावली महारात्रि है। प्रतीक है कि संसार भी रात की तरह निष्ठुर है। हम सभी का जीवन अमावस की रात-सा ही है। पौराणिक मान्यताएं कहती हैं कि इस रात लक्ष्मी हर घर-द्वार पर दस्तक देती हैं। जो जागा हुआ मिलता है उस पर कृपा करती हैं और जो सोया पड़ा रहता है, पड़ा ही रह जाता है। लक्ष्मी अर्थात सुख, वैभव, सम्पदा उसी को मिलते हैं जो ‘अमावस के अंधेरे’ में ‘पुरुषार्थ के दीपक’ जलाने के लिए ‘व्रतपूर्वक जागता हो।’ जैसे खरा दीपक रातभर जागता है और अपने होने का पुरुषार्थसिद्ध करता है, ठीक उसी तरह जाग्रत को ही लक्ष्मी की सिद्धि होती है, यानी मेहनत करने वाले को ही समृद्धि हासिल होती है।
-
जब समाज में आरोग्य, पवित्र रूप और जागरण का आलोक फैलता है तो ‘कृष्ण पक्ष’ विदा हो जाते हैं। गोवर्धन पूजा का पर्व अनेक सम्पदाओं का प्रतिनिधित्व करते हुए दीपावली को पूर्णता प्रदान करता है, जिसके केंद्र में सहकार है। धन का सदुपयोग तो मिल-बांटकर भोग करने में ही है फिर चाहे नई फसलों की धान्यलक्ष्मी हो या गोवर्धन पूजा की पौराणिक कथा की तरह ब्रजमंडल का दूध-घी। श्रीकृष्ण ने इंद्र के रूप में ‘राजा’ के एकाधिकार को चुनौती दी। समझाया कि पर्व हो या पकवान, फसल हो या ख़ुशी, सबके साथ साझा की जाए तभी धरती भी अन्नलक्ष्मी से निहाल करती है और खाद्य पदार्थों के ‘गोवर्धन’ खड़े हो जाते हैं।
-
भाईदूज के साथ दीपावली की पांच दिनी पर्व शृंखला पूर्ण होती है। भाई का बहन के घर पर आना परिवार में आपसी मेलजोल का प्रतीक है। माता-पिता के बाद भाई-बहन ही हमारे सबसे निकट सम्बंधी होते हैं। इनके परस्पर स्नेह सम्बंध ही जीवन में किसी को सच्चा धनवान बनाते हैं। पौराणिक संदर्भो में यम और यमी/यमुना की कथा के बहाने भाई-बहन के नेह नाते की रक्षा के इस पर्व में हर तरह के सम्बंधों के प्रति दायित्व का भाव भी है। तभी तो भाईदूज के बहाने समाज ‘दीपावली मिलन’ के उत्सव सजा लेता है।
Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today
from Dainik Bhaskar https://ift.tt/32IpeIy
No comments:
Post a Comment