हमारे देश में कहीं भी एक रात घूमने भर से पता चल जाता है कि कैसे हजारों पुरुष और महिलाएं फुटपाथ पर सोते हैं। शहर हो या गांव, वहां रहने वाले ऐसे कई लोग हैं जिनके लिए जमीन ही उनका बिस्तर है और ठंडी रात उनकी रजाई है।
आंत्रप्रेन्योर लक्ष्मी मेनन ने ये नोटिस किया है कि पीपीई किट के बचे हुए टुकड़े कई बार शहर में यहां-वहां पड़े हुए दिखाई देते हैं। इस तरह के दो या दो से अधिक कपड़ों को उन्होंने अपने बेडरोल बनाने के लिए आपस में मिलाया। इस बिस्तर को लक्ष्मी ने 'शैया' नाम दिया।

लक्ष्मी कहती हैं इस तरह के बेड बनाने से दो फायदा हुआ। बेकार बचे हुए कपड़ों का सही इस्तेमाल हुआ। साथ ही सुविधाजनक बेडरोल बनने से इसका उपयोग करने वाले मरीजों को आराम मिला।

शैया को कहीं भी ले जाना काफी आसान है क्योंकि ये आसानी से फोल्ड करके रखे जा सकते हैं। इन्हें रजाई की तरह फोल्ड करके रख सकते हैं। बुजुर्गों के लिए भी यह बिस्तर काफी सुविधाजनक है।
शैया बनाने के लिए किसी खास अनुभव की जरूरत नहीं होती है। इसके लिए ज्यादा पैसे भी नहीं चाहिए। सिर्फ आपके दिल में लोगों की सेवा करने का जज्बा होना चाहिए।

अगर केरल की बात की जाए तो यहां सैकड़ों टन कपड़े जला दिए जाते हैं। इन कपड़ों का इस्तेमाल बेडरोल जैसे कामों में कर हम दूसरों की मदद की जा सकती है। लक्ष्मी कहती हैं मेरा प्रयास उन सभी लोगों के लिए आदर्श स्थापित करेगा जो दूसरों की सेवा करने का जज्बा रखते हैं।
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